Wednesday, June 29, 2011

PACL की 'स्कीमों' में डूब सकता है निवेशकों का पैसा

श्रुतिजीत के के
नई दिल्ली : हाल ही में शनिवार की एक दोपहर। पश्चिमी


दिल्ली के पश्चिम विहार के डीडीए मार्केट में ए-6 बिल्डिंग। बाजार में कई दुकानें बंद थीं लेकिन इस इमारत से कई लोग जल्दबाजी में निकल रहे थे। इस कॉम्प्लेक्स की तीसरी मंजिल पर एक गुमनाम रियल एस्टेट कंपनी पीएसीएल इंडिया लिमिटेड का दफ्तर है। जहां तक पहुंचने के लिए अंधकार में डूबी हुई सीढि़यों से गुजरना पड़ता है, जिसकी दीवारों पर पान की पीक के निशान हैं। गर्मी की दोपहर होने के बावजूद पीएसीएल इंडिया लिमिटेड के ऑफिस में काफी गहमागहमी थी। यहां सैकड़ों लोग जमा हुए थे। दफ्तर में किसी बैंक के ब्रांच जैसा माहौल था। कई काउंटर पर लेन-देन हो रहा था और लोग छोटे ग्रुप में बातचीत कर रहे थे।

पश्चिमी दिल्ली सहित देश भर में फैले 280 ऑफिस से पीएसीएल जो कारोबार करती है, उसे सेबी अवैध मानता है। सेबी का मानना है कि यह कलेक्टिव इनवेस्टमेंट स्कीम है, जिसे रियल एस्टेट कंपनी के रूप में चलाया जाता है। हालांकि कंपनी के वास्तविक कारोबार के रूप में अभी अंतिम रूप से कुछ भी नहीं कहा गया है। सुप्रीम कोर्ट इस मामले पर अंतिम फैसला देगा, जहां यह पिछले आठ साल से लंबित है।

इस दौरान पीएसीएल का कारोबार बढ़कर 100 गुना हो गया है। ग्राहकों ने प्लॉट बुक कराने के लिए कंपनी को ये पैसे दिए हैं। हालांकि ग्राहकों को वह प्लॉट दिखाया गया है और ना ही उन्होंने अपनी पसंद की जमीन का टुकड़ा खुद चुना है। पीएसीएल के पास जमा ग्राहकों का पैसा बढ़कर 20,000 करोड़ रुपए हो गया है। कंपनी इसे अग्रिम भुगतान बताती है। रजिस्ट्रार ऑफ कंपनीज को दी गई जानकारी में कंपनी ने अपने पास 1.85 लाख एकड़ जमीन होने की बात कही है, जो पूरे बंगलुरु के बराबर है। इसके मुकाबले देश की बड़ी रियल एस्टेट कंपनियों डीएलएफ या यूनिटेक के पास सिर्फ 12,000-15,000 एकड़ जमीन है। जमीन से ज्यादा पीएसीएल के ग्राहकों की दिलचस्पी इसकी कीमतों में संभावित बढ़ोतरी से होने वाले फायदे पर है। पीएसीएल ने पांच से 10 साल के दौरान ग्राहकों से जितने रिटर्न का वादा किया है, वह सालाना 12.5 फीसदी से कुछ ज्यादा बैठता है।
 पीएसीएल के पास डिपॉजिट जुटाने के लिए करीब 8 लाख एजेंटों का नेटवर्क है। ये पुराने पिरामिड स्कीम या चेन सिस्टम मॉडल पर काम करते हैं। यदि सुप्रीम कोर्ट का फैसला सेबी के पक्ष में रहता है और वह इसके कारोबार को कलेक्टिव इनवेस्टमेंट स्कीम बताते हुए इसके सख्त रेगुलेशन का फैसला सुनाता है तो पीएसीएल के लाखों ग्राहकों को कंपनी में जमा अपनी बचत से हाथ धोना पड़ सकता है। पिरामिड के सबसे नीचे के ग्राहकों को सबसे ज्यादा नुकसान उठाना पड़ेगा।

पीएसीएल इस तरह की स्कीम चलाने वाली देश की इकलौता कंपनी नहीं है। देश भर में कई कंपनियों द्वारा इस तरह की स्कीमें चलाई जा रही हैं। लोगों को रातो-रात अमीर बनाने की लालच देकर इस तरह की स्कीमें चलाई जा रही हैं। इसके लिए कानून पर लचर तरीके से अमल जिम्मेदार है। कुछ मामलों में निवेशकों की शिकायत पर गिरफ्तारियां भी हुई हैं। कंपनी मामलों का मंत्रालय (एमसीए) देश भर के बड़े अखबारों में कलेक्टिव इनवेस्टमेंट स्कीमों के खिलाफ जागरूकता अभियान चलाकर ग्राहकों को सावधान कर रहा है। एमसीए के सचिव डी के मित्तल ने कहा कि ऑनलाइन स्कीमों और दूसरी कलेक्टिव इनवेस्टमेंट स्कीमों के खिलाफ कई शिकायतें मिलने के बाद सरकार ने जागरूकता अभियान शुरू किया है। उन्होंने यह भी कहा कि उन्हें पीएसीएल के खिलाफ शिकायत नहीं मिली है। हालांकि दूसरी जगहों पर इस तरह की स्कीमों को लेकर कई शिकायतें मिली हैं।ग्वालियर के कलेक्टर आकाश त्रिपाठी ने कहा कि कलेक्टिव इनवेस्टमेंट योजनाओं को लेकर उन्हें 16 कंपनियों के खिलाफ 10,000 शिकायतें मिली हैं। इनमें पीएसीएल भी शामिल है। उनके प्रशासन ने पिछले महीने पीएसीएल और इस तरह की दूसरी कंपनियों के बैंक खातों को फ्रीज करने के लिए कदम उठाया था। साथ ही उसने ऐसी कंपनियों की प्रॉपर्टी सील करने की भी शुरुआत की। त्रिपाठी ने कहा, 'यह बहुत बड़ा तमाशा है। ये कंपनियां कह रही हैं कि वे जमीन या पशु या भगवान जाने किस चीज के नाम पर डिपॉजिट ले रही हैं, लेकिन असल में वे फाइनेंस ऑपरेशन चला रही हैं।'
पीएसीएल की स्कीम पिरामिड स्कीम की तरह दिख सकती है और इसका काम करने का तरीका पिरामिड स्कीम की तरह हो सकता है, लेकिन इसे पिरामिड स्कीम नहीं कहा जाता। कंपनी के डायरेक्टर एस भट्टाचार्य ने कहा, 'हम एक रियल एस्टेट कंपनी हैं। हम जमीन की खरीद-बिक्री के कारोबार में हैं। ग्राहक जमीन खरीदने के लिए हमें पैसा देते हैं।' उन्होंने कहा कि ग्राहक जमीन के लिए किस्तों में पैसा देते हैं और स्कीम की मियाद खत्म होने पर उन्हें फैसला करना होता है कि वे प्लॉट लेना चाहेंगे या इसे बेचने से मिलने वाली रकम लेना चाहेंगे। प्लॉट चाहे मुंबई के उपनगर में हों या मध्य प्रदेश के गांव में, कंपनी उन्हें एक समान मानती है और संभावित रिटर्न के बारे में संकेत देती है।

पीएसीएल के एजेंट जो ब्रॉशर बांटते हैं, उसमें दावा किया गया है कि कंपनी के पास 10 करोड़ 'प्लॉट मालिक' हैं। अगर इस दावे पर यकीन किया जाए तो इसका मतलब यह होगा कि 15 साल से ज्यादा उम्र वाले 170 भारतीयों में से एक पीएसीएल का ग्राहक है। पीएसीएल सिर्फ रैंडम ढंग से प्लॉट के आवंटन की वजह से अलग नहीं है। दरअसल, जब पैसे का भुगतान किया जाता है तो कंपनी एक सर्टिफिकेट जारी करती है। इसमें यह लिखा जाता है कि योजना की मैच्योरिटी पर निवेशक को कुल कितनी रकम मिलेगी। यदि कोई ग्राहक 500 वर्ग गज प्लॉट के लिए 50,000 रुपए देता है तो वह छह साल में 1,01,365 रुपए या 10 साल में 1.85 लाख रुपए पाने की उम्मीद कर सकता है।

भट्टाचार्य ने बताया कि योजना की मियाद पूरी होने पर करीब 80 फीसदी लोग प्लॉट के बदले रकम का विकल्प चुनते हैं। ग्राहक के नजरिए से देखा जाए तो वह जमीन के टुकड़े की पूरी तरह अनदेखी कर सकता है। वह पीएसीएल के किसी ब्रांच में जाए, पैसा जमा करे और योजना की मियाद पूरी होने पर आकर्षक रिटर्न की उम्मीद करे। ऐसे में इसे समझने में मुश्किल नहीं होनी चाहिए कि कैसे यह 'छह साल में पैसा दोगुना' करने की योजना में बदल गई। यही हो भी रहा है। पीएसीएल के एजेंट को 15 फीसदी तक कमीशन मिलता है।

कंपनी के पास एजेंटों की विशाल फौज है। इसलिए देश के कई इलाकों में, खासतौर पर छोटे शहरों और गांवों में पीएसीएल की योजनाओं की अच्छी पूछ है। यही नहीं जो भी पीएसीएल की योजना में पैसा लगाता है, वह कंपनी का एजेंट बन जाता है। इनकी संख्या तेजी से बढ़ रही है। ये लोग कंपनी की योजना के बारे में एक दूसरे को बताते हैं। इससे कंपनी को जबरदस्त प्रचार हासिल हो रहा है। पश्चिम विहार से मदुरई और नवी मुंबई तक एजेंट निवेशकों को एक ही बात बता रहे हैं। 'पीएसीएल पब्लिक लिमिटेड कंपनी है।' 'यह कंपनी मामलों के मंत्रालय के तहत आती है।' ' कंपनी 1983 से काम कर रही है और इसने कभी भी पेमेंट को लेकर डिफॉल्ट नहीं किया है। ' देश के कई इलाकों में एजेंट यही दावा कर रहे हैं। इससे पता चलता है कि उन्हें कितनी 'बढ़िया' ट्रेनिंग दी गई है।

किसी भी कंपनी में अगर 50 से ज्यादा शेयरधारक हों तो उसे पब्लिक लिमिटेड कंपनी माना जाता है। हालांकि पीएसीएल के एजेंट इसे कुछ इस तरह से पेश करते हैं, जैसे कंपनी को सरकार का समर्थन हासिल है या कानूनी मंजूरी मिली हुई है। कंपनी मामलों के मंत्रालय से जुड़े दावे को लेकर भी यही हालत है। सभी कंपनियों को मंत्रालय की इकाई रजिस्ट्रार ऑफ कंपनीज के पास रजिस्ट्रेशन कराना पड़ता है। 28 साल के ट्रैक रिकॉर्ड की बात बहुत पेचीदा है। दरअसल, कंपनी का रजिस्ट्रेशन 1996 में हुआ था। शायद यह बात संबंधित कंपनी पीजीएफ लिमिटेड का हवाला देकर कही जा रही है। पीजीएफ लिमिटेड 1986 में रजिस्टर्ड हुई थी। 2002 में इसे कारोबार बंद करने और निवेशकों का पैसा वापस लौटाने का आदेश दिया गया था।

भट्टाचार्य का कहना है कि एजेंट ज्यादा कमीशन के लिए बढ़ा-चढ़ाकर दावे कर रहे होंगे, लेकिन इसके लिए कंपनी को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। हालांकि पश्चिम विहार के ऑफिस का नजारा कुछ अलग ही था। इस दफ्तर में इस संवाददाता ने दो दिन तक काफी वक्त गुजारा। यहां कई एजेंट अक्सर 'पैसा दोगुना करने' की बात कहते हुए नजर आए। अपने दावे के समर्थन में वो ब्रॉशर दिखा रहे थे। इसमें बेहद उलझे हुए चार्ट बने हुए थे। चार्ट में निवेश पर रिटर्न दिखाया गया था। साथ ही इस पर एजेंट के कमीशन का ब्योरा भी था। दरअसल, एजेंटों के हाथ में पीएसीएल की प्रचार की कमान है और इसका सबसे ज्यादा फायदा कंपनी को मिल रहा है।

31 साल के अनिल वर्मा को बचपन में ही पोलियो हो गया था। वह पीएसीएल के एक ऐसे ही एजेंट हैं। वर्मा ने बताया कि पीएसीएल का एजेंट बनने के बाद उन्हें उम्मीद की किरण दिखी और उन्हें नियमित आमदनी भी होने लगी। वर्मा 10वीं की परीक्षा में फेल हो गए थे। इसके बाद उन्होंने कई रोजगार किए। इनमें प्लंबिंग का काम भी शामिल है। उन्होंने बताया कि जब से वह पीएसीएल के एजेंट बने हैं, तब से वह बेहतर जिंदगी के सपने बुन रहे हैं। उनके आसपास नजर आने वाले पीएसीएल के दूसरे एजेंट इसके सबूत हैं।

वर्मा ने ऐसे ही एक एजेंट के बारे में बताया, जो पहले दिल्ली की आजादपुर मंडी में सब्जियां बेचा करता था। वर्मा ने कहा, 'आज वह बड़ा आदमी है। उसने अपना घर खरीद लिया है, उसके पास कार है...आपको पता है, उसे हर महीने नियमित आमदनी होती है।' वह शख्स वर्मा से पिरामिड में दो पायदान ऊपर है। वह हर महीने 10 लाख रुपए का कमीशन क्लीयर करता है। वर्मा ने बताया, 'उसने सभी को चेक दिखाए हैं।' इनसेंटिव के तौर पर पीएसीएल उन एजेंटों को कार और मोटरसाइकिल तोहफे के रूप में देती है, जो सबसे ज्यादा निवेशक लाते हैं।

इस तरह के नेटवर्क की खूबी यह होती है कि इसमें कुछ ही लोग बड़ा पैसा बनाते हैं। और यही लोग वर्मा जैसे ज्यादातर लोगों की प्रेरणा होते हैं। वर्मा जैसे लोगों के हाथ हर महीने कुछ हजार रुपए आते हैं। हर डिपॉजिट पर करीब 33 फीसदी कमीशन दिया जाता है। एजेंटों के पास जो कमीशन चार्ट है, उससे यह बात पता चली। वहीं भट्टाचार्य ने बताया कि कंपनी हर डिपॉजिट पर सिर्फ 7-8 फीसदी कमीशन देती है। पीएसीएल की बैलेंस शीट से पता चलता है कि यह आंकड़ा 12 फीसदी है।

भट्टाचार्य को अपने एजेंट नेटवर्क को पिरामिड स्कीम या फर्जी योजना कहा जाना नागवार गुजरता है। हालांकि वह यह कहते हैं, 'यहां चेन सिस्टम है, यह बात सच है।' हजारों एजेंट के नीचे कई एजेंट काम कर रहे हैं। मदुरई में एक एजेंट ने अपने बॉस के बारे में बताया। उन्होंने कहा कि उनके बॉस के नीचे 8,000 एजेंट काम करते हैं। अगर पीएसीएल मुश्किल में फंसती है और भुगतान को लेकर परेशानी खड़ी होती है तो लाखों निवेशकों के साथ इतनी बड़ी संख्या में एजेंटों को भी खामियाजा भुगतना पड़ेगा।

यह ऐसी आशंका है, जिसकी कल्पना वर्मा जैसे लोग नहीं करना चाहते। उन्हें पक्का यकीन है कि ऐसा कभी नहीं होगा। उन्होंने कहा, 'मान लीजिए कि कंपनी आपका पैसा नहीं लौटा रही है, लेकिन जमीन तो आपके पास है, ना?' हालांकि निवेशकों के पास जमीन की टाइटल डीड नहीं है। उन्हें सिर्फ कंप्यूटर से निकाली गई रिसीट दी गई है। वर्मा ने इसे मामूली बात बताया। उन्होंने कहा, 'आप कभी भी कंपनी मामलों के मंत्रालय के पास जा सकते हैं और स्लिप दिखा सकते हैं। उन्हें आपको जमीन देनी ही होगी क्योंकि पीएसीएल, मंत्रालय के तहत आती है।' यह उस तरह का झूठ है, जिसने पीएसीएल के नेटवर्क को बनाया हुआ है और जिससे यह लगातार बढ़ रहा है।

साल 1997 में प्लांटेशन कंपनियों, एंग्रो कंपनियों और ऊंचे रिटर्न का वादा करने के बाद निवेशकों की रकम लेकर चंपत हो जाने वाली ऐसी ही अन्य स्कीमों को लेकर काफी हो-हल्ला मचा। सरकार ने तब एलान किया था कि ऐसी कंपनियों को कायदे-कानून के दायरे में लाया जाएगा। यूटीआई के पूर्व चेयरमैन एस ए दवे की अध्यक्षता में एक समिति बनाने के साथ इस सिलसिले में कोशिशों का आगाज भी हुआ। उस समिति की रिपोर्ट ही सेबी के कलेक्टिव इनवेस्टमेंट स्कीम रेगुलेशंस, 1999 का आधार बनी।

दवे समिति ने सीआईएस स्कीमों को तीन अहम विशेषताओं के आधार पर परिभाषित किया- निवेश की पूलिंग, एक अलग इकाई के जरिए प्रबंधन और निवेशकों के दिन-प्रतिदिन नियंत्रण का अभाव। समिति ने कहा था, 'प्रॉपर्टी के प्रबंधन में निवेशक का अख्तियार न होना ऐसी स्कीमों का दर्जा तय करने में अहम पैमाना होना चाहिए।'

सेबी ने 1999 में जब सीआईएस नियमों को अधिसूचित किया, तो 1,000 से अधिक कंपनियों से अपना बोरिया-बिस्तर समेटने और निवेशकों को उनकी रकम लौटाने को कहा गया। पीएसीएल और पीजीएफ, दोनों के नाम उस सूची में थे। दोनों ने उच्च न्यायालयों में अपील की। पीजीएफ लिमिटे ने पंजाब में और पीएसीएल लिमिटेड ने राजस्थान में, जहां वह पंजीकृत है।

पंजाब हाईकोर्ट ने व्यवस्था दी कि पीजीएफ लिमिटेड साफ तौर पर कलेक्टिव इनवेंस्टमेंट स्कीम है। कोर्ट ने उसे अपना धंधा बंद करने को कहा। कोर्ट ने कहा कि पीजीएफ का यह दावा कि उसकी एकमात्र गतिविधि कृषि भूमि की खरीद-फरोख्त और उसका विकास है, 'फर्जीवाड़ा और महज कागजी ट्रांजैक्शन है जिसे उसकी असली हरकत पर परदा डालने के उद्देश्य से किया जाता है।'

साल 2008 में सेबी की ओर से की गई जांच में पाया गया कि कंपनी ने निवेशकों को रिफंड करने के आदेश का पालन नहीं किया। सेबी ने तब इसके प्रमोटरों और अधिकारियों के शेयर बाजार में सौदे करने पर 10 साल की रोक लगा दी। इनमें भांगू, पीएसीएल के भट्टाचार्य (तब पीजीएफ में जनरल मैनेजर थे) और पीएसीएल के कंपनी सेक्रेटरी एस के गौड़ शामिल थे। गौड़ पीजीएफ लिमिटेड के भी कंपनी सेक्रेटरी थे।

पीएससीएल और पीजीएफ की योजनाएं एक जैसी थीं। गौड़ ने कहा कि पीजीएफ के मामले में वे इस लिहाज से अलग थीं कि प्लॉट के आकार काफी बड़े थे। हालांकि, राजस्थान उच्च न्यायालय ने कहा कि पीएसीएल को कलेक्टिव इनवेंस्टमेंट स्कीम नहीं माना जा सकता है। सेबी ने इस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील की। बाजार नियामक ने इस स्टोरी पर टिप्पणी करने से इनकार कर दिया।

पीएसीएल के कामकाज की वैधानिकता का सवाल तो सुप्रीम कोर्ट में चला गया, लेकिन दो ऐसी बातें हुईं, जिनसे पीएसीएल को नाटकीय रूप से बढ़ने में मदद मिली। एक तो यह थी कि कंपनी का एकाधिकार सा हो गया क्योंकि सेबी की कार्रवाई के चलते अधिकतर प्रतिस्पर्द्धी योजनाएं बंद हो गईं। दूसरी बात यह हुई कि इस ग्रुप ने साल 2005 में एक टीवी चैनल पी 7 शुरू किया। यह चैनल पीएसीएल के लिए विज्ञापन प्रसारित करता है, जिसमें कंपनी को एक भरोसेमंद ब्रांड के रूप में दर्शाया जाता है।

नवी मुंबई में एक एजेंट ने पूछा, 'यह तो हर समय टीवी पर दिखता है। क्या आप पी 7 नहीं देखते?' पीएसीएल को इस बात से फायदा मिल जाता है कि कई दावों पर सवाल ही नहीं उठाए जाते और दूसरी ओर आजकल न्यूज टीवी की विश्वसनीयता काफी है।

पीएसीएल और पर्ल्स इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स लिमिटेड जैसी ग्रुप कंपनियों तथा हिंदी न्यूज चैनल चलाने वाली कंपनी के संबंध की तस्वीर स्पष्ट नहीं है। भट्टाचार्य ने कहा कि वे सभी सहयोगी कंपनियां हैं। उन्होंने स्वामित्व के ढांचे पर टिप्पणी करने से इनकार कर दिया। पीएसीएल और पर्ल्स ग्रुप की अन्य कंपनियों के मालिकाना हक तय करना काफी मुश्किल है।

मसलन, पीएसीएल का मालिकाना हक 73 विभिन्न इकाइयों में बंटा है, जिनमें से कई कागजी कंपनियां हैं, जिनका स्वामित्व सूची में शामिल दूसरी कंपनियों के पास है। यह एक बड़ा नेटवर्क है, जो कंपनी के असली मालिकों पर परदा डालता है और चूंकि भारतीय कानून बेनेफिशियल ओनरशिप का खुलासा करने की अनिवार्यता पैदा नहीं करते, लिहाजा इनका काम चल जाता है।

कुछ सुराग रजिस्ट्रार ऑफ कंपनीज के पास रेगुलेटरी फाइलिंग से मिलते हैं। ऐसी कम से कम 17 कंपनियां हैं, जो पीएसीएल लिमिटेड और भांगू की ओर से प्रमोट की गई पीजीएफ लिमिटेड, दोनों में शेयरधारक हैं। अप्रैल 2010 में भांगू और उनकी पत्नी प्रेम कौर ने पीएसीएल लिमिटेड में अपने 14,78,000 शेयरों (कंपनी की पेड-अप कैपिटल के 7.36 फीसदी के बराबर) को विभिन्न इकाइयों में स्थानांतरित किया। भट्टाचार्य ने बार-बार पूछने पर बताया कि पीएसीएल के एमडी सुखदेव सिंह तो भांगू के ही रिश्तेदार हैं। हालांकि, भट्टाचार्य ने कहा कि भांगू का इस कंपनी से कोई लेना-देना नहीं है।

पर्ल्स ऑस्ट्रेलेशिया नामक इकाई की वेबसाइट से कुछ और जानकारी मिलती है। ऑस्ट्रेलिया से काम करने वाली इस कंपनी को 'नई दिल्ली के पर्ल्स ग्रुप ने लॉन्च किया था।' पर्ल्स ऑस्ट्रेलेशिया के पास गोल्ड कोस्ट पर शेरेटन मिराज होटल है। भांगू और उनके बेटे हरविंदर सिंह भांगू इस कंपनी के बोर्ड में हैं, जो अपनी वेबसाइट पर्ल्स र्पल्स ग्रुप को भारत का 'सबसे बड़ा निजी भूस्वामी और भारत के तेजी से उभरते कॉरपोरेट समूहों में से एक' बताती है। पर्ल्स इंफ्रास्ट्रक्चर, पीएसीएल इंडिया, पर्ल्स ब्रॉडकॉस्टिंग कॉरपोरेशन, पर्ल्स स्पाइसेजपर्ल्स पर्ल्स टूरिज्म और ज्ञान सागर मेडिकल कॉलेज का जिक्र इस वेबसाइट पर पर्ल्स ग्रुप के तहत किया गया है।

पीएसीएल अपना विज्ञापन तो आक्रामक ढंग से नहीं करती है, लेकिन इसकी सहयोगी पर्ल्स इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स ने हाई-प्रोफाइल माकी है। कंपनी इस समय आईपीएल की टीम किंग्स इलेवन पंजाब की मुख्य प्रायोजक है और उसने ऑस्टेलियाई तेज गेंदबाज ब्रेट ली को अपना ब्रांड एंबेसडर बनाया है। 'पर्ल्स ग्रुप' कैरेबियाई द्वीप समूह में खेली जा रही भारत-वेस्टइंडीज एकदिवसीय क्रिकेट प्रतियोगिता और टी-20 टूर्नामेंट की टाइटल स्पॉन्सर भी है।

भट्टाचार्य और गौड़ ने सुप्रीम कोर्ट की ओर से प्रतिकूल फैसला आने की संभावना को 'काल्पनिक सवाल' कहकर खारिज कर दिया। हालांकि, अगर उनके प्रतिकूल फैसला आया तो कंपनी के आसमानी वादे पूरे करने के लिए जरूरी कैश फ्लो को तगड़ा झटका लगेगा। भट्टाचार्य ने कहा, 'हम कानून का पालन करेंगे और जो भी दिशानिर्देश मिलेगा, उसके अनुसार चलेंगे।' कंपनी ने अपने पास मौजूद विशाल लैंड बैंक का मूल्यांकन दो ग्लोबल रियल एस्टेट कंसल्टिंग फर्मों जोंस लैंग लसाल और सीबी रिचर्ड एलिस की मदद से करना शुरू कर दिया है। 
 
A ET REPORT







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